कविता : अद्यापक
शोर को समेटे
अँधेरे को लपेटे
रात के सिर पर
अटका लैंप।
रात दिन
आंधी तूफ़ान
यहाँ तक कि
धुआं उगलते हुए
शहर का प्रदुषण सहते हुए
सड़कों
फुटपाथों और शहरियों की
विकृत मानसिकता को
भोगते,
प्रकाश कि
चादर औढ़ाकर
पथिक को उसका
पथ इंगित करता
स्वयं
पल पल अपनी
जीर्णता को
पहनता, खता और ओढ़ता
परन्तु
कहलाता फिर भी
'अटकता ' लैंप
' लटकता ' लैंप
' खटकता ' लैंप
शोर को समेटे
अँधेरे को लपेटे
रात के सिर पर
अटका लैंप।
कविता : रिश्ते
कविता : कब तक
करके लोकतंत्र को स्वीकार
रहता है इंतजार
अब सत्ता को कौन सा दल
करके हरण
जमाएगा अपने चरण;
सत्तारूढ़
लेकर सदन की शरण
क्या गुल खिलाएगा
बेईमानी और ईमानदारी की घर्षणा
अपने को
बेगुनाह साबित करने के लिए
कैसे छटपटाएगी
खून के आंसू बहाएगी;
भ्रष्टाचार किन झलकियों से
हो कर प्रभावित
शोषण और शोषित की लीला से
करके मनोरंजन
निकलेगा कौन सा फरमान;
दांव पर लगाकर हमारा जीवन
अय्यारी से नचवाएंगे
सिक्कों की झंकार पर
कठपुतलियों की तरह
और हम
अपने ही तमाशबीन हो कर
अपने ही हाथों को
स्वयं पीट-पीट कर
बजाएंगे ताली
कब तक।
कविता : शीशा
अपने अस्तित्व की
पहचान को मिटाकर,
आईना बनकर
मान बढ़ाता हूँ;
सजाकर, संवाद कर,
प्रतिबिंब प्रतिरूप तुम्हारा,
आश्वस्त करता हूँ।
मेरे होने से
कई परतों के नीचे,
छुपा देते हो तुम
अपनी मलिनता
और इठलाकर,
अपने लिपे पुते सवरूप से
फेंक देते हो मेरी ओर
वक्र मुस्कान;
झुठलाती है जो मेरे
पारदर्शी अस्तित्व को
और दर्शाती है,
तुम्हारा मिथ्या अहंकार;
अपनी इस गति पर
शक्ति बटोरता हूँ
तो अदृश्यभाग
कराह उठता है;
जरा संभल कर,
वरना
टूटा शीशा
बन जाता है नश्तर।
कविता : उलझन
विद्यालय से मिली छुट्टी,
समस्याओं की खुली गठरी।
कई विषयों का मिला काम,
पहले दूँ किस को अंजाम?
गणित का आज बाजार,
चलता इससे व्यापार।
होगा फार्मूला जब याद,
जीवन होगा तभी आबाद।
विज्ञान विशिष्ट ज्ञान है,
प्रकृति के इस में प्राण है।
इससे करके पहचान है,
बन सकते हम महान है।
इतिहास से है अतीत,
पूर्वज बन जाते मीत।
सुनते आजादी का गीत,
देते हमको नई सीख।
सारी धरती गोल है,
सिखाता हमें भूगोल है।
दिशाओं का देता ज्ञान,
मौसम का यह फरमान।
संस्कृत से सभ्यता,
इसमे नीतियों की गहनता।
संस्कारों की यह खान,
सुरक्षित रखती हमारी आन।
हिंदी राष्ट्र की भाषा है,
मैत्री के इस से आशा है।
भाषा से मिलता है ज्ञान,
विश्व से हो जाती पहचान।
कविता : नियति
मैं
सूर्य पुत्री
निकलकर पर्वत श्रृंखलाओं से
लांगती हुई
पाषाण और झाड़ियों को
आई झरने की तरह
तुम्हारे इस लोक में,
भर दिए खेत-खलियान
अमृत तत्व से
बनी जीवनदायिनी
सदियों से तुम्हारे लिए।
किंतु
पृथ्वी पुत्र तुम
मलिन-दूषित
कर के मुझे
रहे सक्रिय
मिटाने के लिए
मेरे अस्तित्व को,
साधने को अपना स्वार्थ
भर दिया घुटन से
मेरे जीवन को
फिर भी मैं
बहती आई हूं;
बह रही हूँ
शिव की संगिनी होने का
गौरव पाकर
विष पीने की आदी हो गई हूँ।
कविता : परिचय
मिठास की आड़ में
उसने कुछ फल चखे,
जो निकले, खट्टे- कसीले
हताश होकर फेंके पत्थर
कुछ पत्ते गिरे टूटकर
एक हवा का झोंका
दे गया मिट्टी को धोखा
ले गया पत्तों को पार
जहां मृत्यु का, सिखाया व्यापार
तब मेघ गरजे, बिजली कड़की
उसके विदेशी वस्त्रों ने आग पकड़ ली
झुलसने लगा अंग-अंग
तप्त किरणों से कोढ़ बन गए घाव।
चुकाना पड़ा भाव
लगा हाँफने,था बेहाल
मुंह से बाहर थी जीभ लाल
घूरा वृक्ष की ओर
मचाने लगा शोर
वृक्ष मुस्कुराया बोला
"मेरी सभ्यता देती शीतल छाया
मेरी संस्कृति जीवन दायिनी
एक शाखा है
'बुद्ध' व 'महावीर'
एक 'नानक' एक 'कबीर'
एक 'राम' एक 'रहीम'
तना 'परम-हंस'
जड़ वेद-पुराण
अहिंसा का फल सबको चखाऊं
सब जानते हो क्या बतलाऊं
तुम चाहे तो शरण में आओ
कोढ़ पर चंदन लगाओ
वरना निर्जन वन में जाओ
चारों ओर न दुर्गंध फैलाओ
मेरे बसेरे नीड में आओ
संवार रहे हैं, सपने अपने
भाती नहीं उन्हें कुवास
साक्षी जिसका है 'इतिहास'
कविता : शबनम-सा मधुमास
जिंदगी का हर श्वास होता आखिरी
हर कदम का उल्लास होता आखिरी।
पलता है हर ज़ख़्म एक छाँव के तले
हर बार यह एहसास होता आखिरी।
मन बुनता रहे जाल उलझता रहे
पल पल उम्र का ह्रास होता आखिरी।
हर पल का सफर चाहता इक डगर
रास्ते का हर मोड़ होता आखिरी।
मुखोटों के धनियों की देखी ऐसी रीत
शबनम-सा मधुमास होता आखिरी।
कविता : नीर नभ में
नींद नयन-सेज पर,
बदल रही थी करवटें
दुखी ह्रदय में स्वप्न,
सहेज रहे थे सिलवटें।
तपन भाप बनकर
गगन की ओर बढ़ चली,
संग शीत लहर के,
टकराई और बरस पड़ी।
चारो ओर शोर था,
अंकुर एक नया खिला,
रिमझिम बरसात में,
संगीत है नया जगा।
नेह-कलश को डुबो दिया,
मैंने जब जलद-जल में,
चुपके से आकर बदली,
ले गई नीर नभ में।
कविता : उलझन
विद्यालय से मिली छुट्टी,
समस्याओं की खुली गठरी।
कई विषयों का मिला काम,
पहले दूँ किस को अंजाम?
गणित का आज बाजार,
चलता इससे व्यापार।
होगा फार्मूला जब याद,
जीवन होगा तभी आबाद।
विज्ञान विशिष्ट ज्ञान है,
प्रकृति के इस में प्राण है।
इससे करके पहचान है,
बन सकते हम महान है।
इतिहास से है अतीत,
पूर्वज बन जाते मीत।
सुनते आजादी का गीत,
देते हमको नई सीख।
सारी धरती गोल है,
सिखाता हमें भूगोल है।
दिशाओं का देता ज्ञान,
मौसम का यह फरमान।
संस्कृत से सभ्यता,
इसमे नीतियों की गहनता।
संस्कारों की यह खान,
सुरक्षित रखती हमारी आन।
हिंदी राष्ट्र की भाषा है,
मैत्री के इस से आशा है।
भाषा से मिलता है ज्ञान,
विश्व से हो जाती पहचान।
कविता : किस्मत की यह कैसी रेल
छुटियाँ मुझे मिली माँ,
खेलने मुझे दे दो माँ
छुट्टी की यह पहली भोर
नाच उठा है मन का मोर
लेकर पतंग और डोर
चाहूं मैं गगन का छोर
आँखोंवाली पतंग है मेरी
मचाना चाहूं खूब शोर
छुटियाँ मुझे मिली माँ
खेलने मुझे दे दो माँ
लेकर बस्ता कंधे पर
पसीने से हो जाता तर
याद तब मुझे आता घर
नयन अश्रुओं से जाते भर
रोने से भी लगता डर
छुपे उनको पी जाता
छुटियाँ मुझे मिली माँ
खेलने मुझे दे दो माँ
अस्सेम्ब्ली की जब बजती घंटी
होती है तब कठिन घड़ी
कमीज़ नहीं होती धुली
जूतों पर होती धूल चढी
नाखूनों में मैल जमी
घबराहट से हो जाता विकल
छुटियाँ मुझे मिली माँ
खेलने मुझे दे दो माँ
घर पहुँचता थका हरा
लेकर काम ढेर सारा
देती हो एक ही नारा
कार्य ख़त्म करो सारा
मैं एक अकेला बिचारा
लेता कुंजी का सहारा
छुटियाँ मुझे मिली माँ
खेलने मुझे दे दो माँ
परीक्षा मुझको सताती है
नित्य नए रूप दिखती है
रातूं देर तक जगती है
मन को मेरे नहीं सुहाती है
चैन कोसोँ दूर भागती
किस्मत की यह कैसी रेल?
छुटियाँ मुझे मिली माँ
खेलने मुझे दे दो माँ




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